भरतकूप : भगवान भरत के कुएँ की पौराणिक नगरी और बुंदेलों का ऐतिहासिक स्थल

   दिन की शुरुआत एक सफ़र से शुरू होती है, यही सफ़र हमें हमारी मंजिल तक पहुँचाता है। आज मैं आपको ऐसे नगर की सैर पर ले चलता हूँ जो  पौराणिक महत्त्व के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्त्व भी रखता है । आइये चलते हैं आज के सफ़र में और पहुँचते हैं उस मंज़िल तक जिसे हमेशा से इंतजार रहा है उन रहनुमाओं का जो बेवजह ही उनका हाल चाल लेने समय-समय पर आते रहते हैं...
आज की मंजिल ....
भगवान भरत के कुएँ की पौराणिक नगरी और बुंदेलों का ऐतिहासिक स्थल ;  भरतकूप

 
         दोस्तों मेरे लिए यह बहुत खुशनुमा पल है कि  मुझे आपको अपनी गृह नगरी चित्रकूटधाम कर्वी से महज़ 15 किमी की दूरी पर स्थित धार्मिक नगरी भरतकूप की यात्रा पर ले जाने का सौभाग्य मिल रहा है। 

      
    भरतकूप, चित्रकूट ज़िले में स्थित एक धार्मिक स्थल है। इस धार्मिक नगरी  के सबसे नज़दीक  चित्रकूटधाम कर्वी रेलवे  स्टेशन है। रेलवे  स्टेशन से भरतकूप महज़ 17 किमी की दूरी पर स्थित है। रेलवे स्टेशन से आटो करके यहाँ पहुँचना सुविधा जनक एवं क़िफ़ायती भी है। हालांकि भरतकूप में भी एक  रेलवे स्टेशन की सुविधा उपलब्ध है। 

    
     भरतकूप, प्रसिद्ध हिन्दू धार्मिक तीर्थ स्थली है। इस प्राचीनतम तीर्थ स्थल के साक्ष्य महान कवि तुलसीदास जी के द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के अयोध्याकांड में मिलते हैं। साक्ष्यों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन समय में भगवान राम के छोटे भाई भरत भगवान राम को खोजते हुए चित्रकूट धर्म नगरी पहुँचे और भगवान राम से अयोध्या वापस लौटने का निवेदन किया। 

          जब भगवान राम उनके साथ वापस अयोध्या लौटने तथा राज्याभिषेक के लिए राजी नहीं हुए, तब भगवान भरत ने अपने साथ अयोध्या से लायी हुई राज्याभिषेक सामग्री एवं विभिन्न पवित्र नदियों का जल अत्रि मुनि के द्वारा बताये गये अनादि स्थल में बने एक कुएँ में  डाल दिया। तब से यह अनादि स्थल भगवान भरत के कुएँ की नगरी 'भरतकूप' के नाम से जग जाहिर हुआ। 
पवित्र कुआँ
   
   मान्यता के अनुसार यह कुआँ आज भी अपनी  पवित्रता को बनाए हुए है। इस कुएँ से जुड़ी इस पौराणिक घटना के कारण इस धार्मिक नगर का नाम भरतकूप है। इस पौराणिक नगर में हिन्दूओं के पवित्र त्यौहार मकर संक्रांति, अमावस्या, कार्तिक मास तथा माघ मास में तीर्थयात्रियों का यहाँ पर जमावड़ा लगता है।

    मकर संक्रांति से अगले पाँच दिनों तक यहाँ एक विशाल ग्रामीण मेले का आयोजन किया जाता है, जहाँ सैलानियों को लोक कला से रूबरू होने का सुनहरा मौका मिलता है, और मेले में बनी गर्म जलेबियों का तो क्या कहना ..मानो मेले में आने का सर्वोच्च आनंद मिल गया हो। मेले में आए सैलानी ग्रामीण संस्कृति देख मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।


श्री भरत मन्दिर
     यहाँ आये सैलानी/तीर्थयात्री यहाँ कर पवित्र कुएँ के जल से स्नान कर आनन्द उठाते हैं साथ ही पुण्य भी अर्जित करते हैं। तीर्थयात्री कुएँ से जल निकालने के लिए पारंपरिक विधि का प्रयोग करते हैं तथा रस्सी और बाल्टी का प्रयोग करते हैं। यहाँ पर यह मान्यता है कि रस्सी और बाल्टी का  दान करने से महान पुण्य मिलता है इस मतानुसार यहाँ पर आने वाले सैलानी  रस्सी और बाल्टी का दान भी करते है।


भगवान भरत-मांडवी और राम दरबार
     
     इस कुएँ के पास ही एक प्राचीन श्री भरत मन्दिर है। इस मंदिर के अहाते में ही यह पवित्र कुआँ स्थित है। यह भरत मंदिर भारत के प्राचीनतम मंदिरों में से एक भरत मन्दिर है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान भरत और उनकी पत्नी माण्डवी की संयुक्त मूर्ति विराजमान है। 

    इस संयुक्त मूर्ति के साथ-साथ भरत के अग्रज भगवान राम और उनकी पत्नी सीता तथा भगवान राम के अनुज लक्ष्मण की मूर्तियाँ इस मंदिर के गर्भगृह की शोभा को बढ़ाती हैं। यहाँ भगवान भरत और उनकी पत्नी माण्डवी की मूर्तियाँ बलुआ पत्थर की बनी हुई हैं जो अत्यंत प्राचीन काल की है तथा शेष अन्य मूर्तियाँ सफ़ेद संगमरमर की बनी हुई हैं। मूर्तियों का अलंकरण वस्त्रों एवं आभूषणों द्वारा किया गया है जो इन मूर्तियों की शोभा में चार चांद लगाते हैं। मन्दिर के अहाते में भगवान शिव की प्राचीन एक शिवलिंग स्थापित है। यह शिवलिंग भी भरतकूप आने वाले  तीर्थ यात्रियों के लिए एक आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है।


ग्रेनाइट की चट्टानें




      
     भरतकूप की भौगोलिक स्थिति और यहाँ का शानदार प्राकृतिक नज़ारा यहाँ की दूसरी ख़ास बात है जो यहाँ आने वाले सैलानियों को अपनी खुबसूरती से मंत्रमुग्ध कर देता है। सैलानी यहाँ आकर यहाँ की ऊँची-ऊँची पहाड़ियों के समूहों से रूबरू होते है। ग्रेनाइट एवं बलुआ पत्थर से निर्मित इन पर्वत  श्रृंखलाओं पर लगे छोटे-बड़े पेड़-पौधे पर्वत  श्रृंखलाओं पर मधुमक्खियों की तरह आच्छादित है। यह प्राकृतिक सौंदर्य, आँखों को एक सुखद अनुभूति प्रदान कराता है।  



ग्रेनाइट को तोड़ने की मशीन

ग्रेनाइट के पत्थरों से बना कुदरती रंगीन ग्रामीण भवन

   यह एक पहाड़ी नगर है। इस नगर की ग्रामीण आबादी इन पहाड़ियों में ही रहती है। भरतकूप नगर की भौगोलिक स्थिति यहाँ निवास करने वाली ग्रामीण आबादी के लिए एक वरदान है क्योंकि यहाँ ग्रेनाइट चट्टानो का जख़ीरा है इस कारण यहाँ के निवासी  जीविकोपर्जन के लिए  पत्थर तोड़ना है  का कठिन एवं परिश्रमी कार्य करते हैं। भरतकूप नगर की अधिकांश आबादी ग्रामीण निवासी हैं वह रहने के साथ ही साथ यहाँ के निवासियों के आर्थिक आय का एक साधन भी है। भरतकूप एक पहाड़ी इलाका है, जहाँ पर पहुँचकर आग्नेय चट्टान ग्रेनाइट  की ऊँची-ऊँची पहाडियों से रूबरू हो सकते हैं।   


खजुराहो उपशैली में बना मन्दिर

ऐतिहासिक मन्दिर
   
     मैंने ब्लॉग की शुरुवात में जिक्र किया था....; भरतकूप में स्थित एक ऐतिहासिक बुन्देली मंदिर का.......यह ऐतिहासिक मंदिर भरतकूप से 4 किमी की दूरी पर जे.एम.मार्ग (गोंडा) कोरारी संपर्क मार्ग पर स्थित है।

     यह मन्दिर बुन्देली स्थापत्यकला शैली का अद्भुत नमूना है। इस स्थापत्यकला को खजुराहो उपशैली के नाम से भी जाना जाता है।  इस मंदिर का निर्माण बुन्देलखण्ड के चंदेल शासकों द्वारा कराया गया था। इस मंदिर के निर्माण में पीले तथा लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया। मन्दिर की दीवारों पर बनी प्रतिमाएं अप्सराओं, देवी- देवताओं तथा विशेष प्रतीकों को बड़ी खूबसूरती और बारीकी के साथ उकेरा गया है। जिससे वह सजीव हो उठे हैं। 
  






        मंदिर के गर्भगृह में कोई भी मूर्ति नहीं मौजूद…… यहाँ अगर गर्भगृह में आज कुछ देखने को है तो; वह .... परिन्दों के आशियाने.... यहाँ देखने के लिये,,, मंदिर के  रूप में सिर्फ़ अवशेष ही मौजूद हैं। इस बुंदेली मंदिर का संरक्षण पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के द्वारा किया जा रहा है।






   || शुक्रिया भारत ||
 

Comments

  1. Feeling proud to belong from this great mythological and spiritual place "Bharatkup".

    विश्व भरण पोषण कर जोई।
    ताकर नाम भरत अस होइ।।
    जो न होत जग जनम भरत को।
    सकल धरम धुरि धरनि धरत को।।

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    1. आपका शुक्रिया अदा करता हूँ.....

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